सतनामी समाज के महान विभुतियो में सहोदरा माता
होली पर्व में डुम्हा में होता है गुरू दर्शन मेला
सतनामी समाज के महान विभुतियो में सहोदरा माता की
होली पर्व में डुम्हा में होता है गुरू दर्शन मेला अठारहवीं शताब्दी में छत्तीसगढ़ में नारी उत्थान के लिए संघर्ष करने वाले और समाजिक कुरीतियों का विरोध करने वाले,भारत के महान व्यक्तियो में से एक छत्तीसगढ़ के प्रथम समाज सुधारक, समानता और मानवतावादी विचारधारा के अग्रदूत एवं छत्तीसगढ़ में सतनाम धर्म के पुनर्उद्धारक और संस्थापक परम पूज्य संत गुरु घासीदास बाबा। जिन्होंने अध्यात्म के साथ - साथ लोक व्यवहार और उत्कृष्ट मानव समाज के निर्माण के उद्देश्य से जाति एवं वर्ण विहीन समता मूलक सतनामी समाज का निर्माण किया, मानव - मानव एक समान का उदघोष करते हुए उन्होंने पुरूषवादी समाज में नारी जाति को समानता और सम्मान दिलाने का कार्य किया। संत गुरु घासीदास बाबा ने निरंतर सन 1795 से 1860 तक मानव कल्याण और जनहित के लिए कार्य करते हुए सतनाम धर्म का उपदेश दिया। कालान्तर में सन् 1820 में उनके कार्यों को सतनाम धर्म आंदोलन ( satnami religious movement 1820) के नाम से , ब्रिटिश दस्तावेज में उल्लेखित किया। जिसका जिसका उल्लेख विभिन्न सेंट्रल गजेटियर में किया गया है।
सहोदरा माता संत गुरु घासीदास बाबा की संतानों में से ज्येष्ठ कन्या थी। जिसे सहोदरा, सुभद्रा, अमृता नामों से जाना जाता है। सहोदरा माता बाल्यकाल से ही संत गुरु घासीदास बाबा के सतनाम आदोंलन में संलग्न थी। वे काफी बुद्धिमान, चातुर्य, नीति निपुण, साहसी तथा युद्ध कला में पारंगत थी। रूखमणि,गिरीजा,कल्याणी,बिस्मत, उनकी बाल सखिया थी जो सतनामी समाज में कुशल महिला चिंतक और नीतिज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित थी। सफुरा माता के साथ सहोदरा माता ने भी नारी उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने हिन्दू धर्म में प्रचलित होली त्यौहार सहित अन्य धार्मिक परंपराओं का विरोध किया जिसमें नारी जाति को अपमानित, और उत्पीड़ित किया जाता था। वे आरंभ से ही नारी समानता के पक्षधर थी। सहोदरा माता का जन्म सन 1780 में छत्तीसगढ़ के गिरौदपुरी गाँव तहसील कसडोल जिला बलौदाबाजार में हुआ। उनके पिता का नाम संत गुरु घासीदास बाबा और माता का नाम सफुरा माता है।
सन 1795 में जब गुरू अमरदास जी ने अज्ञात वास धारण किया तत्पश्चात सफुरा माता भी समाधिस्थ हो गयी। फिर संत गुरु घासीदास बाबा ने भाई मनकूदास जी को सहोदरा माता और सफुरा माता का भार देकर सतनाम ध्यान साधना के लिए गिरौदपुरी के घने जंगलों में जा कर छै महिने के लिए समाधिस्थ हो गये।
(सेन्ट्रल प्रोविंसेस गजेटियर 1867)
उक्त काल में सहोदरा माता ही समाधिस्थ सफुरा माता की देख रेख करती रही। छै महिना बाद जब संत गुरु घासीदास बाबा सतनाम प्राप्ति कर वापस आये तब सफुरा माता को चैतन्य करते हुए लोगों को सतनाम धर्म का उपदेश दिया।
गुरु घासीदास बाबा ने सहोदरा माता को धयान योग सतनाम साधना को दीक्षित किया। वर्तमान में डुमहा धाम में सहोदरा माता के झापी विद्यमान है साथ ही गुरु घासीदास बाबा द्वारा दिया गया कंठी भी यथावत स्थित है। सहोदरा माता ने लोगों को सतनाम पर आस्था और विश्वास रखते हुए देवी देवता के मूर्ति पूजा करने से मना किया और निर्रथक त्यौहार और उसके दौरान किया जाने वाले शराब और मांस के सेवन का विरोध किया। तात्कालिक समय में होली त्यौहार के अभद्रता का विरोध करते हुए उन्होंने सबको स्त्री के मान सम्मान और मर्यादा के उद्देश्य से होलिका दहन का विरोध किया। और लोगों को होलिका जलाने के स्थान पर वृक्ष लगाने के लिए प्रेरित किया। महिलाओं के सम्मान के लिए होली त्यौहार के प्रचलित अनर्गलता का विरोध किया। इस, उपक्रम में गुरु घासीदास बाबा ने लोगों को त्यौहार के परिपेक्ष्य में अनावश्यक खर्च, शराब ,मासांहार, जुआ इत्यादि के विरोध में त्यौहार को त्यागने का निर्देश दिए। तब से (1795) सतनामी समाज के लोगों ने मुर्ति पुजा और त्यौहारों का निषेध किया। जिसका उल्लेख सेंट्रल गजेटियर में भी किया गया है।
प्रति वर्ष होली पर्व पर जिले रायपुर के आरंग विधानसभा क्षेत्र के अंतिम छोर में बसा ग्राम डुम्हा में सहोद्रा माता के पास छोड़े संत शिरोमणि गुरू घासीदास बाबा जी की कंठी खड़ाऊ माले आदि ऐतिहासिक धरोहरों आभूषणों की दर्शन के लिए गुरू गद्दी दर्शन मेला आयोजन किया जाता रहा हैं। इसके अलावा जिले बिलासपुर के विधान सभा क्षेत्र मस्तूरी के अंतिम छोर में बसा ग्राम कुटेला में भी न होली पर्व मनाया और होलिका दहन किया जाता रहा हैं।
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