एक थे राजीव गांधी देश के पूर्व प्रधानमंत्री
प्रेस छत्तीसगढ़ महिमा रायपुर। 22 मई 2021, पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी जी की कल 21 मई को पूरे भारत देश और प्रदेश के शहरी ग्रामीण क्षेत्रों में उनके पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हे विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सादर नमन किया गया। छत्तीसगढ़ प्रदेश के मुखिया भूपेश बघेल मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर राजीव गांधी के नाम से किसान न्याय योजना अंतर्गत किसानों को प्रथम किस्त जारी करते हुए राजीव गांधी किसान न्याय योजना की शुभारंभ किया।
राजीव गाँधी को 1984 मिला "बहुमत" जनादेश कम था , देश की भावनाओं और आंसुओं का समन्दर अधिक था। राजीव गाँधी राजनैतिक रूप से अपरिपक्व ऐसे लोगों के बीच में घिर गये जो इंदिरा गाँधी के समय में उनके आफिस के दरवाज़े हाथ जोड़े खड़े रहते थे।
यही लोग बाद में भाजपा और संघ के समर्थक बन गये।
राजीव गाँधी के मन में घृणा ,सांप्रदायिकता या किसी के प्रति हृदय में द्वेष नहीं था। वह साफ और नरम दिल के राजनैतिक अपरिपक्व व्यक्ति थे।
दरअसल,जिस वक्त इंदिरा की हत्या हुई थी उस वक्त प्रणब मुखर्जी उनकी कैबिनेट में सबसे वरिष्ठ मंत्री थे। ऐसे में यह तय था कि इंदिरा गांधी की मौत के बाद कार्यवाहक प्रधानमंत्री प्रणब मुखर्जी को बनाया जाएगा और इसके लिए तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह भी तैय्यार थे। लेकिन अचानक परिदृष्य बदलता है और इंदिरा गाँधी के एम्स पहुंचने के साथ ही कोलकाता में मौजूद राजीव गांधी और प्रणब मुखर्जी दोनों एक साथ कोलकाता से दिल्ली के लिए रवाना हुए।
मगर राजीव गाँधी और प्रणव मुखर्जी के कोलकत्ता से दिल्ली पहुँचने के बीच ही एक शख्स तेज़ी से सत्ता प्रतिष्ठान और लुटियन ज़ोन में सब कुछ बदल देता है।
वह शख्स थे "अरुण नेहरू" , 1980 के दशक में राजनीति की दुनिया में आने से पहले अरुण नेहरू सफल कारोबारी थे। वह "जेनसन एंड निकोल्सन" कंपनी के अध्यक्ष और राजीव गाँधी के रिश्ते में भाई थे।
अरूण नेहरू ने ही इंदिरा गाँधी के राजनैतिक सलाहकार पीसी एलेक्ज़ेन्डर को विश्वास में लेकर "राजीव गाँधी" के कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाने लिए काँग्रेस में "लाॅबिंग" करा दी। सियासत की इसी लॉबिंग के असर से राजीव गांधी को उस साल प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गई। जिससे नाराज होकर प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया और अपनी पार्टी राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बना ली।
यही नहीं, जब तक राजीव गांधी प्रधानमंत्री रहे प्रणब मुखर्जी केंद्र की सत्ता के करीबी नहीं बन सके तो इसका कारण वही "अरुण नेहरू" थे।
ध्यान दीजिए कि यह वही "अरुण नेहरू" थे जिनको रायबरेली में अपने जीवन की पहली चुनावी सभा संबोधित करते हुए "प्रियंका गाँधी" ने अरुण नेहरू को अपने "पिता का गद्दार" कहा था और प्रियंका गांधी के एक मात्र इस बयान ने रायबरेली से चुनाव लड़ रहे अरुण नेहरू का राजनीति से पैकअप करा दिया था।
1984 के चुनाव के बाद राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने और अरुण नेहरू ने उनके इर्द गिर्द संघी लोगों की जमात इकट्ठी कर दी और खुद बन गये देश के गृहमंत्री और इसके बाद गृहमंत्री बने पी वी नरसिंह राव।
इसी सरकार में अरुण सिंह , विश्वनाथ प्रताप सिंह , वीर बहादुर सिंह जैसे धुर्त और शातिर लोगों ने राजनैतिक और प्रशासनिक रूप से अपरिपक्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को घेर लिया।
राजीव गांधी ने जब देश की बागडोर संभाली थी तब से ही उन्होंने 21वीं सदी की बात करनी शुरू कर दी थी और उन्होंने देश की "संचार क्रांति" का बीज डाला , देश में कंप्यूटर और इंटरनेट को जन्म दिया , वह भारत के इसी तरह के नवनिर्माण में आगे बढ़ते रहे।
मगर उनके पीछे संघ के पियादे बन कर "अरुण नेहरू" और उनकी टीम उनसे भयानक गलतियाँ करवाती रहीं , जिनमें शाहबानो और बाबरी मस्जिद का ताला खुलना प्रमुख गलती थी।
यह सब संघ के एजेन्डे के अनुरूप था। ऐसा मानना है कि यह सब फैसले राजीव गाँधी के कम बल्कि उनके इर्द गिर्द मौजूद संघी चंडाल चौकड़ी के अधिक थे जिनको राजीव गाँधी पहचान ना सके। इन 5 सालों में अरुण नेहरू और पी वी नरसिंह राव ने गृहमंत्री रहते देश के सिस्टम में संघियों को महत्वपुर्ण पदों पर बिठा दिया और यही महत्वपुर्ण पदों पर बैठे लोग उस संघ को खाद पानी देकर 1989 तक एक वटवृक्ष बना दिया जो इंदिरा गाँधी के जीवित रहते बिलों में घुसे रहते थे।
राजीव गाँधी ने अपने शासन काल में जितनी गलतियाँ कीं या गलत बयान दिए वह सब इन "चंडाल चौकड़ी" की वजह से ही थे। वीपी सिंह और उनकी चंडाल चौकड़ी ने जब बोफोर्स का ड्रामा किया तो अरुण नेहरू उसी साजिश का हिस्सा थे और अब तो लगने लगा कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के बोफोर्स के गढ़े उस पूरे खेल को संघ का समर्थन उसी तरह था जैसे 2 जी और अन्ना आंदोलन को था। विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ अरूण नेहरू भी राजीव गाँधी के साथ गद्दारी कर गये और 1987 में पूरे देश में राजीव गाँधी के विरुद्ध वीपी सिंह के साथ झूठा अलख जगाने लगे जिसके कारण राजीव गाँधी को 1989 में सत्ता खोनी पड़ी।
21 मई 1991 में अपनी दूसरी सरकार बनाने के प्रयास में एक चुनावी रैली में उनकी हत्या हो गयी।
मगर वह इन 7 सालों में बहुत कुछ सीख चुके थे , लोगों को पहचान चुके थे , और उनकी दूसरी पारी निश्चित रूप से बहुत हद तक परिपक्व होती।
मगर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। राजीव गाँधी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सादर नमन करते हैं। उक्त आलेख को विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित दुर्लभ दिनों की हैं जिनको संग्रहित किया गया था। आज पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी जी की पुण्यतिथि पर विशेष रूप से प्रकाशित करने की अवसर मिल पाया हैं।
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