28 मार्च सतनामी राजा गुरू बालकदास जी के शाहदत दिवस पर नम आँखो से विनम्र श्रद्धांजलि
प्रेस छत्तीसगढ़ महिमा रायपुर। 28 मार्च 2021, परम् पूज्य संत गुरू घासीदास बाबा जी के द्वितीय सुपुत्र राजा गुरू बालकदास जी के सतनाम आंदोलन का असर इतना अधिक हुआ कि अंग्रेजो ने सन 1825 में पहली बार शिक्षा का द्वार हिन्दु धर्म में शुद्र कहे जाने वालो के लिये खोल दी। गुरू बालकदास जी के एकता और समरसता के आंदोलन से अंग्रेज प्रभावित होकर 1828 में राजा घोषित कर हाथी भेंट कर साथ ही अंग रक्षक रखने कि अनुमति भी दी ।
आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में हुये इस परिवर्तन कानून का पुरोधा हमारे गुरू रहे हैं जिनके बदौलत आज समाज शासन प्रशासन में अपना भागीदारी निभा रहा है। सतनाम आंदोलन को बढ़ते देख मानवता वाद के दुश्मन लोग तिलमिला उठे और मानव-मानव एक समान की भावना से ओत-प्रोत धर्म सतनाम को तोड़ने के लिये, सतनाम धर्म के समानांतर रामनामी सतनामी और सूर्यवंशी सतनामी पंथ खड़ा कर दिये । और फिर सतनामी समाज में नाना प्रकार के रिति-रिवाज, रहन-सहन,खान-पान,आचार-विचार के मानने वाले हो गये और यही वह सच्चा कारण है जिसके वजह से हमारी ताकत कमजोर हुई । जब समाज ही अलग अलग पंथो में बटकर अलग अलग विचार धारा को मानने लगे है तो एक मत और एक सिद्धांत की बात करना ही गलत है । गुरूजी के सिद्धांत को त्याग अलग हो गये तो फिर किसी व्यक्ति विशेष की सोंच का औचित्य ही क्या है। लेकिन आज हमे वह कमजोर कड़ी का पता है तब हमारी जिम्मेदारी हो जाती है कि उन बुराईयो का त्याग करके जो गुरू जी ने हमारे लिये सच्चे रास्ते बनाये हैं उसमें सभी को चलने-चलाने का कार्य करना है । जब हम सब, फिर से सतनाम धर्म के रास्ते पर चलकर एकता और समरसता का ब्यवहार करेगें तो हमारी ताकत विशाल हो जायेगी, हम सतनामी समाज को वह स्थान पर देख सकते है जो आज के बुद्धजीवी लोगो का सपना है ।
हमें गर्व है कि हम सतनामी कुल में जन्म लिये जिन्होने दुनियाँ को एकता और भाईचारा का संदेश दिया है । और शिक्षा का द्वार सभी के लिये खोलने में अहम भूमिका अदा किये ।
अगर सतनामी समाज को एक सूत्र में बांधा जा सकता है तो वह सिर्फ सतनामी एवं सतनाम धर्म की बात को आगे बढ़ाकर ही किया जा सकता है। इसलिये सबसे पहले प्रयास यह होना चाहिये कि जो सतनामी समाज से अलग होकर पंथ बनाये हैं उन्हे पुनः सतनामी समाज के विचार धारा से जोड़ना ताकि सतनामी और अन्य विचार धारा वाले सतनामी में एकरूपता आये ।
28 मार्च 1860 को सतनामी समाज के राजा गुरू बालकदास जी का धूर्त,पाखण्डी,अकुलीन व्यक्तियों द्वारा औंराबांधा में कपट पूर्वक सतनाम आंदोलन को दबाने के लिये गुरू बालकदास जी को समाज के खातिर बलिदान कर दिये। और समाज का विकास जो तीव्र गति से हो रहा था वह अचानक रुक सा गया,लेकिन गुरू बालकदास जी के अनुयायी उग्र रूप से असमाजिक तत्वो के लोगो के साथ संघर्ष करने लगे। जहां भी सतनामी समाज के उपर कुछ भी अन्याय अत्याचार होता तो एकजुटता के साथ मिलकर वे लोग मुकाबला करते थे। फिर कुछ समय पश्चात राजा गुरू बालकदास जी के छोटे भाई आगरदास दास जी ने समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य तीव्र गति से प्रारम्भ कर दिये, गुरू बालकदास जी के बलिदान से समाज में रोष ब्याप्त था जब गुरू आगरदास जी ने गुरू का सत्ता संभाले तो समाज के लोग उनका साथ देने के लिये तन मन धन से आगे आने लगे । गुरूओ ने रामत प्रथा को आधार मानते हुये अपना अभियान को गाँव - गाँव तक पँहुचाने लगे जिससे समाज आगे बढ़ते ही रहा । परन्तु उसी समय कोर्ट कचहरी के चक्कर में सतनामी समाज के लोगो को अभियुक्त बनाकर परेशान करने का भी साजिश रचने लगे,इससे यह हुआ कि समाज के धनी लोगो का पैसा कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने में बर्बाद होते गये और समाज कमजोर होने लगा । आज भी आप लोगो ने देखा व सुना होगा कि छत्तीसगढ़ के जेलो में सतनामियो की संख्या ज्यादा है । इन्ही सबको देखते हुये गुरू परिवार के लोगो ने राजनीति सहारा लेकर समाज को आगे बढ़ाने का सोचा और राजनीति में प्रवेश कर गये । जगतगुरू अगमदास जी, गुरू माता ममतामयी मिनीमाता ने वह सब कुछ.... जो समाज खो चुका था उसे पुनः पटरी पर लाने का कार्य किये अपनी कुशलता के दम पर बहुत से अनुकरणीय कार्य समाज के लिये किये जिनको समाज कभी भी भूल नही सकता ।
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