बलिदानी राजागुरू बालक दास जी जयंती पर्व पर विशेष
प्रेस छत्तीसगढ़ महिमा गिरौदपुरी धाम। 29 अगस्त 2021,
जीवन परिचय - छत्तीसगढ़ के महान संत शिरोमणि गुरू घासीदास बाबा जी व माता सफुरा के द्वितीय पुत्र राजागुरू बालक दास जी का जन्म 1801 को भाद्र पक्ष अष्टमी को हुआ। राजागुरू बालकदास बाल्यकाल से ही बहुमुखी प्रतिभा का धनी रहा है। उन्होने अपने पिता संत गुरू बाबा घासीदास जी व बड़े भाई संत गुरू अमरदास जी तथा समकालीन साधु संत महापुरूषों की संगत में रहकर अध्यात्मीक,व्यवहारिक,वैचारिक व न्यायिक पाठ पढ़, कायाखण्ड को समझा तथा बाल्यकाल में ही अपने मित्रों से खेल खेल (राजा चोर,भौरा बाटी, अन्धीचपाट, रूखचढ़वा,खडुवाखेल ) में राजा बनकर जो न्याय करते थे उससे बड़े बड़े विद्वावान भी चकित हो जाते थे।
युवा अवस्था - राजागुरू बालकदास जी युवा अवस्था में पहुंचते ही मानव कल्याण व समाज सुधार के लिए अपने पिता संत गुरू बाबा घासीदास जी के द्वारा चलाये जा रहे सतनाम आंदोलन,संदेश,उपदेश वाणी को जन जन तक पहुचानें के लिये संकल्पित हो गये थे। संत गुरू बाबा घासीदास जी अपनें दोनों पुत्र की समाज व मानव सेवा करने की कार्य क्षमता, ललक व हजारो भक्तो तथा संतजनो की आग्रह को देखते हुए कार्यो का बटवारा करते हुए गुरू अमरदास जी को संत समाज को सही रास्ता (सतनाम के मार्ग) बतलाने धर्म नीति (मानव जीवन का बोध) व राजागुरू बालकदास जी को राजनीति (मानव समाज को संगठित कर सामुदायिक विकास व शासन में सहभागिता) पर चलनें कहा।
वैवाहिक जीवन - राजागुरू बालकदास जी की पत्नी क्रमशः नीरामाता व राधामाता जी थी। जिनसे नीरामाता से गंगा व गलारा नाम की दो बेटी तथा राधामाता से गुरू साहेबदास जी एक ही पुत्र की प्राप्ति हुई, गुरू साहेब दास जी अल्पायु में ही सतलोक गमन कर गये।
सतनाम आन्दोलन -संत शिरोमणि गुरू बाबा घासीदास जी की आज्ञा पाकर उनके सतनाम आन्दोलन को आगे बढ़ाने की वृहद रणनीति तैयार कर राजागुरू बालक दास जी द्वारा संत जनों को संबोधित करतें हुए कहा कि मेरे जगत के संतों मैं अपने पिता के सत संदेश अमृतवाणी उपदेश को साकार करने का प्रयास करूंगा। सतनामधर्म की ओर गुरू गद्दी सफेद पालो को अजर अमर बनाने के लिए हम अपने गुरू वंशज पीढ़ी को बलिदान करने हेतु तैयार रहेगे, साथ में संत समाज को संगठन शक्ति से तन,मन धन के साथ संघर्ष करना पड़ेगा। संत शिरोमणि गुरू घासीदास बाबा जी के वंशज सर्वोच्च (नेतृत्वकर्ता) पद पर आशीन होगा।
सतनाम संविधान - राजागुरू बालकदास जी ने सर्वप्रथम भारतदेश के समय कालानुसार समाज को सतनाम सूत्र में बाधने स्वतंत्र, समानता, एकता, धर्म रक्षक, सुरक्षा व्यवस्था, अर्थ,न्याय,दण्ड व सामाजिक रीति-रिवाज पर संवैधानिक नियमावली बनाकर कार्य योजना व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने हेतु राजमंहत, जिलामंहत, तहसील मंहत, भंडारी व छड़ीदार पद पर राजागुरू बालकदास जी ने योग्य लोगों की नियुक्ति कर उन्हे क्रमशः राज, जिला, तहसील, अठगंवा व ग्राम स्तर की जिम्मेदारी प्रदान किया था। राजागुरू बालकदास जी सतनामी समाज के संविधान का निर्माता भी है।
सतनाम रावटी - राजागुरू बालकदास जी अपने सहयोगी राजमंहतो, भण्डारी, छड़ीदारों व समाज सेवको को साथ लेकर अपने संतों को सतोपदेश देने सतनाम धर्म प्रेमी लोगो व सामाजिक संगठनों एकता के सूत्र में बाधने बिलासपुर, रतनपुर, रायपुर, सिरपुर, रायगढ़, सारंगगढ़, कर्वधा, कांकेर व बस्तर सहित पूरे मध्य भारत में सतनाम रावटी चला व्यापक सतनाम का प्रचार प्रसार किया था। रावटी में राजागुरू बालकदास जी सतनाम की झण्डा को कभी झूकनें नही देगें की बोध संत समाज को कर्तव्य बोध कराते थे।
राजा की पदवी - गुरू बालक दास जी अपने पिता संत संत गुरू बाबा घासीदास जी के विचार सतनाम संदेश को जन जन तक पहुंचाया व समाजों में हो रहे मानवीय पशुगत अत्याचार, अनाचार, दुव्र्यवहार को रोकने सामाजिक पंचायत का गठन कर समाज में पांच पंच, मंहत, भण्डारी, छड़ीदार राजमंहत का व्यवस्था ग्राम, अठगंवा, ब्लाक, तहसील, जिला व राज स्तर पर सामाजिक विकास व न्याय व्यवस्था का संचालन किया गया। राजागुरू बालकदास द्वारा स्थापित व संचालित सुशासन व्यवस्था प्रणाली से जनता शांति तथा एकता के साथ हजारो लोगो सतनाम धर्म पर आस्था प्रकट करने वालो का कारवा बनता गया। राजागुरू बालकदास जी के शौर्य गाथा से प्रभावित तत्कालीन ब्रिटिश शासन के द्वारा सन् 1820 में राजा की उपाधी प्रदान कर गुरू को हाथी,घोड़ा,अस्त्र-शस्त्र व सोने की तलवार भेट कर सेना रखने की अनुमति प्रदान किया गया। सतनामधर्म के अनुयायियों द्वारा राजा की पदवी लेकर लौट रहे राजागुरू बालकदास जी का भण्डारपुरी में एैतिहासिक स्वागत आवभगत किया गया। स्वागत यात्रा गुरू निवास भण्डारपुरी पहुचने तक एक विशाल सभा का रूप ले लिया जहा, संत गुरू बाबा घासीदास जी व राजागुरू बालकदास जी का दर्शन संत समाज के लोगो को प्राप्त हुआ, जिसे विजयोत्सव व गुरू दर्शन मेला की संज्ञा दिया गया। राजागुरू बालक दास जी द्वारा सन् 1820 में भण्डारपुरी धाम व तेलासी बाड़ा का निर्माण प्रारंभ किया गया। उस समय( छत्तीसगढ़ में ) ब्रिटिश अधिक्षक एगन्यू बटलर 1818 से 1825 तक अंग्रेज शासन का सूत्रपात व नियंत्रण करने के पश्चात अपने पद से त्यागपत्र दिया। उसके बाद क्रमश: कैप्टन हंटर कुछ माह अधीक्षक रहे तत्पश्चात मि.सेन्डीस 1825 से 28 तक रहे फिर विलकिंसन और क्राफर्ड 1828 से 1830 रहे । इसके बाद बारह वर्षो के नियंत्रण के पश्चात एक बार पुनः छत्तीसगढ़ अंग्रेजी हुकुमत से मुक्त होकर मराठो के अधीन चला गया।
राजा व गुरू - राजागुरू बालकदास जी दसो इंद्रिया मन, चित, बुद्धि, अहंकार, क्रोध, काम, मोह, लाभ, जाति,पाति पर विजय प्राप्ति केसाथ ही दस नितियों वेषभूषा, आसन, आहार, त्याग, तपस्या, व्यवहार, पुजा, बल (सेना), नियम (संविधान ), सम्मान (पवित्र जैतखाम) को अपने स्वभाव में अपनाकर मानव समाज को शिक्षा,विकास व स्वाभिमान का संदेश दिया। राजागुरू बालकदास जी के गुरू व राजा के पद अनुरूप मौजूदा मानव समाज में उनके प्रभाव दिखने लगे थे, वे एक विशाल समुदाय के नेतृत्वकर्ता बनकर उभरे व अपने संगठन की शक्ति के कारण उच्चवर्गो को चुभने लगा तब ये लोग साजिस पूर्वक ब्रिटिश शासन काल के अधिकारियो को संत गुरू बाबाघासी दास जी, तपस्वी गुरू अमरदास जी व राजागुरू बालकदास जी के विरूद्ध भड़काने लगे। भारत के आजादी में राजागुरू बालक दास की क्रांतिकारी पहल - इस समय काल 1857 भारत में ब्रिटिश के विरूद्ध आजादी की लड़ाई की शुभारंभ हो चूका था। राजागुरू बालकदास जी भी भारत के आजादी हेतु पहलकर उस समय रामत करके समाज की संगठन शक्ति को बढ़ाने के साथ ही साथ आजादी की लड़ाई के लिए सतनामधर्म के अनुयायियों को आगे ला कर लोगो की मनोबल बढ़ाकर क्रांतिकारी पहल किया। राजागुरू बालकदास जी का देश प्रेम अंग्रेजी हुकुमत व उनके दलालो को खटकने लगे थे व उनकी हत्या करने के लिए योजना व कुचक्र रचा गया था।
राजागुरू का सतलोक गमन - रावटी की अगली कड़ी में राजागुरू बालक दास का 1860 ई. को मुंगेली क्षेत्र हुआ,तथा रूकने का पढ़ाव औराबांधा में रखा गया था। जहां 28.03.1860 को राजागुरू बालकदास जी द्वारा सतनाम सभा में एकत्रित संत समाज के हजारों लोगों को सतनाम संदेश, उपदेश में स्वाभिमान व देश हित में सभी धर्म के लोगों को एकजूट होने का संदेश दिया व रात्रि विश्राम के दौरान योजना बद्ध तरीके से स्थानीय समाज द्रोही शोषक जाति के लोगों से साठ गाठ कर हथीयार बद्ध सतनाम के दुशमनों द्वारा राजागुरू बालक दास की हत्या करने अचानक ही हमला कर दिया। हमले का जवाब राजागुरू बालक दास जी की अगुवाई में विशेष सहयोगी सरहा व जोधाई तथा उपस्थ्ति कुछ गुरू भक्तों ने यथा संभव जवाब दिया लेकिन भारी सख्या में दुशमनों जा पलड़ा भारी पड़ गया। इस लड़ाई में सत्य अहिंसा के पुजारी संत गुरू बाबा घासीदास जी के लाडले पुत्र राजागुरू बालक दास जी अपने सहयोगियों के साथ बलिदान हो गये।
अगले दिन सुबह राजागुरू के हत्या का समाचार चारो दिशाओं में आग की तरह फैल गई, भण्डारपुरी में खबर पाते ही धैर्य खोकर समस्त परिजन व सतनाम धर्म के अनुयायी गण शोक के समुद्र में डुब गये। सबके सामनें मानो संकट का पहाड़ टूट गया था, राजागुरू बालक दास जी के सतलोक गमन से पूरा गुरू परिवार को गहरा आघात लगा। समाज के कल्याण कार्य हेतु कर्तव्य पालन करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले स्वाभिमानी बलिदानी राजागुरू बालकदास जी के अधूरे कार्यो को पूर्ण करने संत गुरू बाबा घासीदास जी द्वारा संत समाज के आग्रहनुसार अपने तृतीय पुत्र गुरू आगरदास जी को सत्य के विधान अनुसार गुरूगद्दी (राजागुरू) का पदभार सौप दिया। संत शिरोमणि गुरू घासीदास बाबा जी की जन्म कर्म महिमा तपो भूमि गिरौदपुरी धाम में राजागुरू बालक दास जी की जयंती पर्व भादों पक्ष के कृष्ण अष्टमी के अवसर पर उनके जयंती पर्व से एक दिन पहले से एक दिन आगे प्रति वर्ष सप्तमी से नवमी तक अर्द्ध वार्षिक गुरू दर्शन संत समागम गिरौदपुरी धाम में मेला भरता आ रहा हैं।
तब से लेकर सतनामी संत समाज के द्वारा आज भी भण्डारपुरी व अगमधाम खडुवापुरी में पावन विजयदशमी को सतगुरू दर्शन मेला में गुरू गद्दीनशीन संत गुरू बाबा घासीदास जी के उत्तराधिकारी पाचवें वंशज जगतगुरू राजागुरू विजयकुमार जी,रूद्रकुमार जी व गुरू रीपुदमन अपने राजमंहतो,भण्डारियों, छड़ीदारों को साथ लेकर भव्य ऐतिहासिक सतनाम शोभा यात्रा में अस्त्र-शस्त्र,अखाड़ा, पंथी गीत नृत्य, व सोने की तलवार,बर्छी,भाल-फर्सा, विभिन्न कलाकार की मनमोहक कलाओं के साथ विशाल विजय जुलुस निकाला जाता है। जुलुस मुख्य कार्यक्रम स्थल में पहुचते ही सत्संग सभा में तब्दील हो जाता है, जहां लाखों श्रद्वालुओं गुरू दर्शन व आर्शिवचन का लाभ उठाते है।
राजागुरू बालक दास जी की जयंती पर्व भादों पक्ष के कृष्ण अष्टमी के अवसर पर अर्द्ध वार्षिक गुरू दर्शन मेला गिरौदपुरी धाम में आयोजन किया जाता रहा हैं जो सप्तमी से नवमी तक गुरू दर्शन मेला आयोजन होता रहा हैं। इस बार 27 से 29 अगस्त 2021 तक आयोजन होने जा रहा हैं। आलेख जगतगुरु सतनाम पंथ से साभार ली गई हैं।
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